कांधो पे सवार हो चले थे शान से वोह जिनके भरोसे जीते थे हम आन से,
फिरंगो ने अपने घर में ही कैद कर दिया था हमे,पर जिद ठान ली थी,
घर के रखवालों ने, जियेंगे तो शान से वरना न जीने देंगे उन फिरंगो को,
और जाते जाते लौटा गए अनमोल तौहफा हमे,देके अपनी जीवन आहुति,
कांधो पे सवार हो चले थे शान से वोह जिनके भरोसे जीते थे हम आन से,


बहुत सही मालविका. अच्छा लगा आपका ब्लॉग देख के | और ऐसे पोस्ट सो बहुत ही अच्छे हैं |
ReplyDeleteलिखते रहिये | ब्लॉग जगत में आपका स्वागत है |
सुयश दीप राय