Tuesday, January 26, 2010

कश्ती.....

उस कश्ती को तो ये मालूम भी न था ,कौन सी लहर ले कर जाएगी उसे अपने संग,
वो तो बस चली जा रही थी, अनजान इस बात से की जिंदगी उसे दिखाएगी कितने रूप रंग,
मन में ले कर जाने कितनी तरंगे, कश्ती को जाना था उस पार,
लहरों ने खेला ऐसा खेल उसके साथ, ले न सकी वो अपनी ही आर,
चली जा रही थी लहरें उसे रौंदती हुई,जाने किस राह,
कश्ती जो जा रही थी उनके भरोसे, निकालीभी न एक आह........

1 comment:

  1. अच्छा प्रयास है |
    प्रशंशनीय
    सुयश दीप राय |
    --

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