Wednesday, January 27, 2010

उचाईयां .....

उचाईयां कितनी हो इसका एहसास नहीं, पर उसको छूने की मन में बसी है आस कहीं,

जुस्तजू ये है की पंख लगे होते काश अपने,तो यूँ उंचाईयों को बस देखा न करते,
उड़ के छुते उन्हें और पुरे होते सारे सपने.


हर कोशिश में होती है एक चाह उसे पाने की,किस तरह उसे पायें, वोह राह है अनजानी सी,
कोई गम नहीं,उंचाईयों को अबतलक छु न सके ,उपरवाले से दुआ है इतनी की हमारी रूह न थके.

1 comment: