
अनजाने राहों पे चलने वाले मुसाफिर , जाग और देख किस ओर तू चला जा रहा है ,
रोक ले क़दमों को अभी , वरना जब अहसास होगा ढूंढेगा खुद को कहाँ है,
ज़ुल्म किसी और पे नहीं कर रहा तू ,अपनी ही आत्मा नाखुश है तेरी,किसी रोज़ जब साथ छुटेगा इसका ,कह भी न सकेगा क्या जिन्दगी थी मेरी,
बाहर के आईने में क्या ढूंढता है , कभी पूछ अपनी रूह से,
मैली सी परछाई पायेगा अपनी , अरमान सारे रह जायेंगे तेरे टूट के,
संभाल अपने कर्मो को , प्रकाश ढूंढता है तुझे,
अँधेरे में खो के खुद को ,बोलेगा पहचानो मुझे,
तू जिस दौड़ में गुम् है , वो खुद ही सिमट जाएगी,
भागता रह जायेगा , आँखों में बस शिस्कियाँ ही आएँगी,
खुद को थाम, और चलता जा उस राह,
तुझे जिंदगी की नहीं , जिंदगी को हो तेरी चाह,मन को पाक रख इतना की , उपरवाला भी तुझपे नाज़ करे ,दुनिया तुझपे नहीं , तू दुनिया पे राज करे ,एक दिन जब तू जागेगा , अहसास होगा तुझे ,
काश ये सपना ना होता , ऐसी जिन्दगी मिलती मुझे,
अनजाने राहो पे चलने वाले मुसाफिर , जाग और देख किस ओर तू चला जा रहा है ,
रोक ले कदमो को अभी , वरना जब अहसास होगा ढूंढेगा खुद को कहाँ है.


प्रसंशनीय कविता,
ReplyDeleteउद्देश्य साफ़ है |
इसी वजह से मैंने सोचा इंजीनियरिंग छोडू और देश सेवा में कूद जाऊ |
आपकी ये पंक्तिया प्रेरित करतीं हैं मुझे ,
"तुझे जिंदगी की नहीं , जिंदगी को हो तेरी चाह,मन को पाक रख इतना की , उपरवाला भी तुझपे नाज़ करे ,दुनिया तुझपे नहीं , तू दुनिया पे राज करे ||"
आपके जैसे कवियों कि जरुरत है देश को , जो देश कि भटकती जनता व युवा को सही राह पे ला सकें...|
अभिनन्दन |